महफिल सजाने वालों, इस तरह महफिल नहीं सजाई जाती है,
किसी को बदनाम कर, अपनी इज्जत नहीं बनाई जाती है।
यहाँ कोई गीत क्या गाया, की गायक आकर यहाँ—
तो हर चीज ही सुनसान नजर आती है।
इस महफिल के मेज पर दो फूल खिले हैं माना,
बाकी यह महफिल ही श्मशान नजर आती है।
विराट कवि सम्मेलन का नाम देकर,
इस तरह भी नहीं बुलाई जाती है।
इन कीमती क्षणों को इस तरह बरबाद करना,
देश को बरबाद करने के बराबर है।
अरे, तेरी सीमाएँ घिरी हुई हैं दुश्मनों से,
और तेरे भवनाओं के पगों में महावर है।
मातृभूमि का कण-कण प्राणों से प्यारा होता है,
इसलिए मेरी सुनो, महफिल सजाना छोड़ दो।
हाथ में बन्दूक लेकर, देश हित बलिदान होकर,
तुम शहीदों की कड़ी में नाम अपना जोड़ दो।
पाठक टिप्पणियाँ