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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
पूत नहीं कहलाओगे

जब तक हड़पी गई भूमि तुम खाली नहीं कराओगे,
जब तक खोई हुई भूमि तुम वापस नहीं कराओगे—
तब तक भारत माता के तुम पूत नहीं कहलाओगे।

छूट रहा है इज्जत तेरी, माँ बहनों का पाक लुटेरा,
बिना इजाजत चला आ रहा घर में तेरे पाँव लुटेरा।
जब तक दुश्मन को अपनी सीमा से नहीं भगाओगे—
तब तक भारत माता के तुम पूत नहीं कहलाओगे।

मैं कहता हूँ तुमसे अब, तुम कायरता को छोड़ दो,
कश्मीर पर आँख लगी जो, उन आँखों को फोड़ दो।
समझौते की बात छोड़ दो, करो युद्ध की तैयारी,
सीमा में जो पाँव बढ़ी है, उन पाँवों को तोड़ दो।
तब तक भारत माता के तुम पूत नहीं कहलाओगे।

माँग रही है बलि स्वतंत्रता, आगे बढ़कर जान दो,
खेलो होली लहू बहाकर, बन्दूकों को तान दो।
दुश्मन है बेशर्म तुम्हारा, ऐसे कभी न मानेगा,
मातृभूमि के लिए अरे तू, अपने खून का दान दो।
तब तक भारत माता के तुम पूत नहीं कहलाओगे।

पौड़-डालरों की ताकत से तनिक न हमको डरना है,
बाँध कफन माथे पर हमको, समर भूमि में चलना है।
दुश्मन है नापाक तुम्हारा और घमंडी लगता है,
बिना युद्ध का वह न हटेगा, यही सत्य अब कहना है।
तब तक भारत माता के तुम पूत नहीं कहलाओगे।

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