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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
झलक न पाया

पीड़ा मिली मुझे चलते डगर पर,
नयनों ने आँसू का बादल पाया।
इतना मिला मुझे अब तक लेकिन,
एक तुम्हारा झलक न पाया।

बाँह कुँवारी, मेरी प्यास है प्यासी,
मन से न जाती भर उदासी।
रातें बिताता मैं हूँ करवट बदलकर,
दिन भर रहता हूँ मैं सन्यासी।
किससे कहूँ अपने मन की तड़पन, मैं पीड़ा,
होठों पे मैंने पतझर पाया।

सबने बुलाया मुझको अपना बनाकर,
लेकिन न तुमने अब तक बुलाया।

द्वार सभी हैं बन्द मिलन के,
और डगर सब हैं सावन के।
जिस पथ पर हूँ पाँव बढ़ाता,
राह वही बन जाते चुमन के।
मिलता न बाहों का सहारा,
पाता न क्षण भर दरश तुम्हारा।

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