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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
महफिल में गीत

इस महल में गीत सुनाने आया हूँ,
बिना उसके मुझे कुछ नहीं आता है।
प्यार का गीत नहीं गा पाऊँगा,
क्योंकि मैं उसके बिन कुछ भी नहीं सुहाता है।

जिस महफिल में उनकी नहीं पाता हूँ मैं,
गीत वह महफिल ही मुझे विरान नजर आती है।
तो सुना देता हूँ औरों के कहने पर,
लेकिन मेरे मन की बीन नहीं बज पाती है।

जिस महफिल में गीत सुनाने आता हूँ मैं,
उस जगह कोई न कोई मुझे अपना बना लेता है।
लेकिन जब मजलिस उठ जाती है वहीं से,
वह भी मुझे ठुकरा देता है।

बुरी निगाहों से न देख मुझे ऐ दुनियाँवाली,
मैं भी किसी के नयनों का एक तारा हूँ।
कोई आस लगाये मेरे लिए बैठा होगा,
क्योंकि मैं भी किसी के भाग्य का सितारा हूँ।

अगर मिल जाता बाहों का सहारा मुझको,
तो मैं अपने यौवन की बीन बना लेता।
तार झनकृत हो जाते हृदय के खुद-ब-खुद,
उजड़ती इस जवानी को फिर से सजा लेता।

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