चमक रहीं सीमा पर तेरे दुश्मन की नंगी तलवार,
लूट रहा है इज्जत तेरी, माँ बहनों का पाक लुटेरा,
और तमाशा देख रहे तुम, रक्षा उसे न देते।
रही करती मानवता तेरे कायरता पर रोती,
कायर बनकर तुम दुश्मन के वारों को सह लेते।
दुश्मन के पंजों से तुझको काश्मीर छुड़ाना होगा,
गरज उठेगा बादल नभ में जब हथियार उठाओगे तुम।
वह उठेगी सभी दिशाएँ, फिर गीत विजय का गाना होगा।
और तमाशा देख रहे तुम वीर शिवा के वो सन्तानों।
नीति नहीं वह नीति जिससे आजादी हो जाये चोरी,
मित नहीं वह शत्रु हमारा जो करता है सीमा जोरी।
अन्यायी के नरसंहार की कब तक सहन करेंगे,
सहना भी अन्याय जगत में केवल अपनी है कमजोरी।
हड़प रहा है सीमा तेरी जाने कब से पाक लुटेरा,
और तमाशा देख रहे तुम, आजादी के अरे दिवानो!
रवत नहीं माँ तेरे रंग में, दुश्मन की करते ही,
मुझे बता दो मेरे साथी, क्यों भावुकता में बहते हो?
बहुत वे शर्म तुम्हारा ऐसे कभी न मानेगा,
पता नहीं क्या हुआ तुझे, अन्याय जगत में सहते हो।
बहक रहा है बिना जरूरत जाने कब से पाँव लुटेरा,
और तमाशा देख रहे तुम — ऐ भारत के वीर जवान!
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