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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
प्राण! मत सोचो

प्राण! मत सोचो कि कल जग इस मिलन को क्या कहेगा।

मान तो तोड़ी प्रिये, यह रात है मधुर बेला की।

साज चाँदनी की गोद में हर शाखर हो रही है मुखरित,
यामिनी की गोद में हर साध मुखरित हो रही है।
चाँदनी में चाह मन की, आज होठ भिगो रही है।
साँस का संगम मिला तो क्यों बह रहा, नफरक कर ले।
प्राण! मत सोचो कि कल जग इस मिलन को क्या कहेगा।

सो रहा है जगत सारा, चाँद नभ में है अकेला।
उठ तरंगें मन सरोवर में, मिलन की बात करती।
अब सही जाती नहीं है प्यास, छोड़ी प्राण खेला।
प्राण! मत सोचो कि कल जग इस मिलन को क्या कहेगा।

प्रश्न तो होते रहे हैं और होते ही रहेंगे,
पर दिवाने प्यार के प्रिय राह पर चलते रहेंगे।
आज गढ़ने दो अधर पर चुम्बनों का ताज मुझको—
है नहीं परवाह कल इस वचन को क्या कहेगा।

चाँदनी में आज यौवन की मधुर बीन बजती है,
यामिनी की बाहुओं में चाह की सजती है।
प्राण! टालो तुम न कल पर, आज की मधुर बेला—
आज मत सोचो कि कल जग इस मिलन को क्या कहेगा।

बाहुओं की घाटियों में सो रहा मदहोश यौवन,
और मुखरित हो रही है आज गूँगी चाह मन की।
ये अधूरे स्वप्न जीवन के वे पूरे हो रहे हैं,
बुझा रही है प्यासी, बुझा रही है आग तन की।
आज मत सोचो कि कल जग इस मिलन को क्या कहेगा।

प्राण! मत सोचो कि कल जग इस मिलन को क्या कहेगा।

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