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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
नदी की धार मत रोको

नदी की धार मत रोको,
मिलन उद्गार मत रोको।
न रोको जिन्दगी की नाव,
तुम महाधार के डर से।

सफर तो हर सुहाना है,
अगर राही दिवाना है।
उसे मिलती सफलता है,
न जो व्यवधान माना है।
किसी की राह मत रोको,
किसी की चाह मत रोको।

हृदय में प्यार पावन है,
पतकार तो साझाधार है, सावन है।
अगर मुस्कान अधरों पर,
जग तो सारा सुहावन है।
हृदय का प्यार मत रोको,
मिलन का द्वार मत रोको।

न रुकती सत्य की वाणी,
कभी संसार के डर से।

— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
तुम

न मुश्किल कुछ भी मनो,
न बाधा को अगर जानी।
तुम्हारे हाथ में सब कुछ,
स्वयं को आज पहचानो।

गिरकर उठो, मत रोको,
कभी आवाज़ मत रोको।
न रुकती सत्य है वाणी,
कभी संसार के डर से।

बिगड़कर स्वप्न सजते हैं,
बुझे दीपक भी जलते हैं।
मगर टूटे हृदय जग में,
नहीं फिर से सम्हलते हैं।
हृदय को आज मत तोड़ो,
मिला जो आज मत छोड़ो।

जो चाहो आज तुम कर लो,
अधर पर तान तुम गढ़ लो।
जवानी पास कुछ दिन है,
मिलन का स्रोत तुम भर लो।

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