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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
कर तो सुभग श्रृंगार

कर ली शुभम श्रृंगार,
घूँघट तले दुल्हन मुस्कराये,
साजन खड़े पास, कर सिन्दूर ले—
व्याकुल जिया, कब सिन्दूर लगाये?

पहली पिया हाथ द्वार,
व्याह की बोदी पे मेहँदी लगाये।
वक्ष से आँचल उड़ उड़ जाये,
चूड़ियों की सुरगुट में जोरी कलाई।
सुभग ढंग बन का श्रृंगार।

शोभा नयन गोरी प्यारा बताओ,
नयन करो दो से चार।
लिखे नयन दुल्हन भोली,
गाये ससुरी राग-गीत सुहाना।

कंगन पहन गोरी, साथ जुड़ आओ—
कहती है दुनियाँ पुकार।

नदी की धार, मत रोको,
मिलन उद्गार मत रोको।
नहीं रुकता पथिक पथ पर,
कभी अंगार के डर से।
पगों में गर खनन है,
तो बूँदों में जवानी है।

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