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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
नदी की धार

धार नदी की मत रोको,
मिलन उद्गार मत रोको।
विवशता का पहरा लगेगी,
हृदय में प्यार पलता है।

नहीं वहता निमन्त्रण, नव तुमने अनुभाया है,
हृदय इतना सरल कि स्वयं तेरे पास आया है।
नयन रोकू मत मोड़ो, मिलन को भूल मत जाओ।

मंदिर मधुमास कुछ दिन का,
अधर पर हास कुछ दिन का।
समय रुकता नहीं क्षण भर,
यहाँ का वास कुछ दिन का।
न शरमाओ, न ठुकराओ,
मिलन का गीत दुहराओ।

तुम्हारे प्यार में पागल,
तुम्हारे रूप का कायल।
चला देने सर्वत्र्य,
न समझो तुम इसे पागल।
करो स्वीकार मुझाको अब,
नहीं जलधर के डर से उदधि में ज्वार बुझता है।

यही वह दिन कि जब तुमने मुझे अपना बनाया था,
यही वह रात जब तुमने महावर पत्र लगाया था।
करो फिर याद वे रातें,
न भूलो प्यार की बातें—रहेगा ज्योति नयनों में।

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