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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
प्यार का मौसम

न शरमाओ प्रिये, आओ, यही है प्यार का मौसम।

प्रतीक्षा की कड़ी तोड़ है,
यही अधिकार का मौसम।

बुझालो आग यौवन की,
सरोवर प्यार का यह है।
न सागर है, न सरिता है,
लिखो तुम गीत अधरों पर—
यही उद्गार का मौसम।

तटों ने दे बुलावा यूँ,
लहर को यूँ बुलाया है।
तरंगों में सँवलती आ,
किनारे गीत गाया है।
करो स्वीकार यह बन्धन—यही स्वीकार का मौसम।

हृदय में घाव है गहरा,
मंदिर है याचना मन की।
उठा लो अंक में ज्वाला,
हरी तुम वेदना तन की।
सजाओ स्वप्न की डोली—यही श्रृंगार का मौसम।

अधर पर गीत लिखने का,
यही अवसर सुनहला है।
मिला है साँस का संगम,
यही स्नान पहला है।
मिला मधुसारा पलभर है—यही मधुसार का मौसम।

किसी की आज बन जाओ,
अधर पर हास कुछ दिन का।
लुटा वा दो अपना सर्वस्व,
मंदिर मधुमास कुछ दिन का।
हृदय की ध्वनि सुना दो तुम—यही अभिसार का मौसम।

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