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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
न शरमाओ प्रिये, आओ

यही अभिसार का मौसम,
यही है रात जिसमें,
चुम्बनों का ताज बनता है।

नरम बोली, गरम पोली में,
कोई साज राजता है।
रँवाली प्यार की मेहँदी—
यही श्रृंगार का मौसम।

आज मैं अपराध करने जा रहा हूँ,
क्योंकि इस अपराध से संसार चलता है।

बाहुओं की घाटियों में आज शखरने गैरी मुखरित,
आज मैं अपराध करने जा रहा हूँ,
क्योंकि इस अपराध में नव प्यार पलता है।

एन सकते अपनी बिन कहे पूरी कहानी,
इसलिए कि चाँदनी में सब क्षमा है, आग पानी।
बाहुओं की घाटियों में आज शाखें मुखरित,
आज मैं अपराध करने जा रहा हूँ,
क्योंकि इस अपराध से महाधार टलता है।

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