फिर वही अपराध करने जा रहा हूँ,
क्योंकि यह अपराध के श्रृंगार का गौरव है।
सब क्षमा है इसलिए कि चाँदनी यह दिन नहीं है,
आज वर्षों बाद मेरी हो रही पूरी कहानी।
नरम हाथों में नशे की, वो ज्ञान आने न रहा—
क्योंकि बन्धन यही अधिकार का मौसम।
लुट चुके मधु घट हजारों, तक मिलन की रात आई,
प्रतीक्षा गई, तब निगी यह सुटका मुस्कराई।
आज यौवन यामिनी में बाहुओं का हार पहना,
पूछता है जगत से होती यहाँ है क्यों जुदाई।
आज मैं अस्तित्व खोने जा रहा हूँ,
क्योंकि यह आँधियार है, अभिसार का मौसम।
फिर वही अपराध करने जा रहा हूँ,
चुम्बनों के तरु तले अभिसार का मौसम सुहाना।
और यौवन का मदिर बन अंक में मर मुस्कराना,
कर रहे संकेत सारे आज नभ के हैं सितारे,
चाँद बाहों को है निमन्त्रण जगत से उसको बुलाना।
फिर वही अपराध करने जा रहा हूँ,
क्योंकि इस अपराध से महाधार टलता है।
पाठक टिप्पणियाँ