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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
जहाँ मिलो हृदय में

इसकी मुझको परवाह नहीं तुम मुझे कहाँ पर मिलती हो,
लेकिन मुझसे जब मिलना हो, तुम मिलो हृदय में प्यार लिए।

मधुमारा रहे या साधार हो,
हो जेठ दुपहरी, सावन हो।
कोई बन्धन है नहीं मगर,
बस प्यार हमारा पावन हो।

इस पार नहीं, उस पार नहीं, मझधार बीच की चाह नहीं,
केवल इतना मैं चाहूँगा, जिस जगह मिली उद्गार लिए।

संध्या हो या उषा सवारी,
सपने की से सजती हो।
पर गरम नरम साँसों के बीच,
बस मन की बीना बजती हो।
मैं नहीं चाहता प्रिय तुमसे, कलयुग की सस्ती सी छाया,
किस वक्त मिली परवाह नहीं, पर मिली मिलन का सार लिए।

इच्छा न मुझे उस जगह, जहाँ मिलने में कोई बन्धन हो,
प्रिय मिली जहाँ कि तुम चाही, पर मिली स्वतु विचार लिए।

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