तुम हो लहर पर, मैं हूँ किनारे,
कैसे हमारा फिर से मिलन हो?
घृणा मेरा मैं इकलौता,
प्रेम मगर की तुम हो रानी,
मैं हूँ बिलखता गीत विरह का,
तुम हो मिलन की रात सुहानी।
चाँद गगन में आ तो गया पर,
कैसे हमारा पूर्ण सपन हो?
बात तुम्हारी जग है सुनता,
और है मिलता मुझको दुश्मन अनबन।
महफिल में तेरी पूजा होती,
और है मिलता मुझको भुलावा।
अन्तर इतना जब हमारे में,
कैसे हमारा प्यार जतन हो?
डोली खड़ी तेरी रूप नगर में,
मेरे आँसुओं से भिगा बिछौना।
गाती तुम्हारी खिलती कली है,
माथे पे मेरे दुख का डिठौना।
तुम चाँदनी हो, मैं हूँ अमावस,
कैसे हमारा एक गगन हो?
प्यास बुझाते तेरे होठ मधुर हैं,
और हमारे घर तरसते।
जलता तुम्हारे नयनों में दीपक,
और हमारे नयन बरसते।
क्षण भर भी हम मिल नहीं पाते,
कैसे हमारा कम सिसकन हो?
सजती उमर की तुम दुल्हन हो,
जलती हुई लाश का मैं उमर हूँ।
फूल पर तेरे पाँव है चलते,
और उपेक्षित अन्ध डगर हूँ।
मैं गीत लिखता, तुम गीत जाती,
कैसे साथ हमारा, कैसे भजन हो?
पाठक टिप्पणियाँ