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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
चाँद तो

चाँद तो माता है गगन में, चाँदनी पर उत्तर सके,
खिल सके चमन की कलियाँ बहारों में,
झूम उठी दिशाएँ, महक उठे गलियों में,
गन्ध आ जाये उपवन के हरसिंगारों में।
फूल तो खिलता है चमन में इसलिए,
कि हर चीज जमीं पर निखर सके।

बाहों में आकर हर रूप निखर जाता है,
मिलन की रात में वक्त गुजर जाता है।
जब अनुकूल होती है धार सागर की,
हर सफर पूर्ण हो जाता है।

जब प्यार की मंजिल आदमी पा जाता है,
तब आदमी के नयनों में स्नेह दीपक जल जाता है।
हर पाँव है राह पर, बढ़ाने के लिए,
हर प्यार है फूल वन खिलने के लिए,
क्योंकि हर यौवन है बाँह में चलने के लिए।

हर चमन विरान नहीं होता है,
हर वीन का पहिचान नहीं होता है।
हर रूप निखर जाता है आकर बाहों में,
जब प्यार अनजान नहीं होता है।

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