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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
अब राम नाम हो जपना है

कोई न हमारा अपना है,
सुख तो जीवन में सपना है।
दुःख से सुख का संघर्ष छिड़ा,
आँखों में आँसू का नर्तन,
दुख की बदली घिर आई है,
अब राम नाम हो जपना है।

बन जाता है सावन पतझार,
छूरी चल जाती आशा पर,
अब रात भर जगना है।

जिस पथ पर पाँव बढ़ाता हूँ,
वह उल्टा चलने लगता है,
जिस दीपक को अपनाता हूँ,
वह दीपक बुझाने लगता है,
लगता पथ पर झुकना है।

निभ पारा नहीं जाती,
हर पथ को वह वह लगती,
गर मिल जाता है राह सही,
तो पाँव को दहराती है,
जीवन में बढ़ जाना है।

अब रूठ रहा है नग गुहारी,
जीवन नैया भँवर-भँवर बीच,
पतवार नहीं कोई जिम्मेदारी,
बनकर निरुपाय बिलखना है।

असहाय अकेला लहरों पर,
दुनिया बहुत ही गहरा है,
सुनता न कोई क्रन्दन मेरा,
यह सारा जग ही बहरा है,
अब लहरों पर ही भरना है।

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