क्षण भर भी वक्त ठहरता जाता संध्या बनकर रह लेता,
आँसू न बहाता नयनों से,
पीड़ा का थप्पड़ सह लेता,
गीला न करो मेरा तू नयन।
गर तुम आ जाती वाही में,
यौवन की वीणा बन जाती,
यह साथ संवर जाती पल में,
हर रोज उमर की सज जाती।
होती कैसी है मिलन रात,
यह राग न पाया है यौवन,
अधरों पर प्यासी प्यारा लिए,
आओ हो नाये आज मिलन।
सह सकता कैसे व्यास अधर,
जब रूप सलोना होता है,
रुक जाओ, आज न कर तू गमन।
गत डाली उपवन का तू कफन,
नव माये गी यह वारा,
रह नायेगी मन में सिसकन।
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