मैं नजर मिलाना चाहा
पर वे नजर बचाकर चलती हैं।
पथ लाखों मिलते चलने के,
लाख अपने मिल जाते हैं,
जो स्वप्न हुए जब राख अरे,
वे स्वप्न न फिर सज पाते हैं,
सपने तक में मुझको तो वह बाहों में आकर ढलती है।
भुला दो भले तुम मुझे आज पथ पर
मगर मैं तुम्हें द्वार देता रहूँगा।
स्वप्न सजे, सजी सेज मिलन की,
खिल गई कलियाँ मन उपवन की,
जलने लगे स्नेह दीप नयन में,
बनने लगी ये बीन यौवन की,
आशा पर छूरी चल जाये,
मंजिल मिलने से पहले ही,
सपना पथ पर ही जल जाये।
फिर भी मैं पथ पर चलता हूँ,
इसलिए कि जग मुझसे कह दे,
उद्गार जगत में धोखा है।
हर मानव स्वप्न सजाता है
पर धार नहीं जब पाता है
तब व्यक्ति पगी को रोक अरे
पथ पर ही वह पछताता है
मैं पथ पर आज सिसकता हूँ।
इसलिए कि जग मुझसे कह दे।
गुब्बार, जगत में धोखा है।
धुल गई माँग जब साध की बेकरती
जिन्दगी का सुहाना सफर व्यर्थ है
बाँह का मैं सहारा नहीं
साथ तेरा दुबारा नहीं परता
गीत लिखता हूँ माना विरह का
मगर मैं तुम्हारा नजारा नहीं चाहता
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