मैं सच कहता हूँ मेरी मंजिल मुझसे दूर नहीं होती
गर मौसम के रूख को मैंने अपना श्रृंगार बनाया होता.
दिन रात न आँसू यूँ बहता
खुद कफन न अपना मैं बुलता
सुख चैन न जाता नींद न जाती
हर वक्त न अपना शिर धुनता
पतझार की अपने जीवन का मैं अभिसार बनाया होता
मैं सच कहता हूँ मेरी मंजिल मुझसे दूर नहीं होती
जिस पथ पर पाँव बढ़ाता हूँ
बस अपना सही मैं पाता हूँ
वीरान जवानी को लेकर
पीकर फिर पिछे मड़ पछताता है
गर पीड़ा की अपने जीवन का मैं संसार बनाया होता
मैं सच कहता हूँ मेरी मंजिल मुझसे दूर नहीं होती।
वाहीसश की चलता
मरघट को मैं दूँढा करता
कोई न बताता राह मुझे
जो भी मिलता मुझको छलता
मिटते अरमानों को मैंने गर अपना प्यार बनाया होता
मैं सच कहता हूँ मेरी मंजिल मुझसे दूर नहीं होती।
अधरों पर विष का प्याला है
सुख स्वप्न बना जीवन में है
उत्पात मचा यौवन में है
है नाव फँसी मझधार बीच
वह पन में मेरी दूसरा है सिसकन
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