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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
विरह गीत

आ रहा है लिए आसरा प्राण मैं
राह पर स्नेह से तुम पुकारो मुझे ।

उम्र तो एक चलता हुआ पाँव है,
साँस तो एक महाधार की नाव है,
कब निगल ले पता क्या लहर नाव को
इसलिए हम मिले आखिर नाव है,

झिलमिलाती लौ दीपक का प्राण मैं
देर मत कर प्रिये अब दुलारो मुझे

जिन्दगी का सफर है अरे प्यार का,
कुछ नहीं काम होता है अँधकार का,
पीर से अब कहीं तुम द्वार से,
है तरखे यहाँ आज उजियार का

आस की खो जता हूँ कहर प्राण मैं
मन व्यक्ति है बहुत तुम सुधारो मुझे ।

है सुहाना सभा चाँदनी रात है,
नयन में कामना और सौगात है,
मैं मिलन के लिए है खड़ा द्वार पर
प्यार पर क्यों भला आज उत्पात है

आज इन्कार छोड़ी अरे प्राण तुम
और मझधार से तुम उठाओ मुझे ।

प्यार में छला हुआ
दर्द में पला हुआ,
आग से तो दूर पर पानी से जला हुआ

पर कभी एक क्षण हम नहीं हैं मिल सके
रात हो गई मगर चाँद आ सका नहीं
राग चल दिया मगर गीत जा सका नहीं।

छोड़ो दो मुझाको डगर पर न मंजिल चाहता
मिट चुकी जब आश की किरणें मधुर तम,
और नींदों में नहीं जब स्वप्न आता,
टूट जाये जिन्दगी के सब सहारे
अब नहीं मैं जगत का परवाह करता

झिलमिलाती आस की किरणें हृदय से कट चुकी हैं।
मैं सच कहता हूँ

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