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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
दर्द पीकर दर्द की आवाज देता हूँ

दर्द पीकर दर्द की आवाज देता हूँ

सब दिया सबको दिया, सबकुछ दिया पर
आज तुझको हाथ से खुद तान देता है।

जब साथ नहीं कोई बरसात बुरी लगती है।
बजे शहनाई पालकी हो बहारों की
दरवाजे घर में लाश हो बारात बुरी लगती है।

न जाने क्यों आज तुम गमगीन नजर आती हो
घूँघट न जाने क्यों उठाती हो न गिराती हो ।
ये जुल्फे, ये गात, ये होठ, ये नजारे,
किसके लिए हैं मैं हूँ पास क्यों न मुस्कराती हो

ये कागज पर ढले हैं जो प्यार के मोती
जमीं के नहीं स्वर्ग के चमकते सितारे हैं
उफनते हुए बबूले पानी में जो बनते हैं
किसी नासी आँखों से ढलते बहारे हैं।

उल्हानों के आँगन खड़ा रहता हूँ
मैं तो तिनका हूँ जल में बहा करता हूँ
जलकर राख बन जाऊँ इसलिए जलता हूँ।

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