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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
पत्र तुम्हारा पाकर

पत्र तुम्हारा पाकर मन से लगा कि मेरी रवशी आाान रद्र गोगहारनवारी 3आई

पाकर के मधुमास वनकी साथ पुराई खिलन
किरण जानो वहार नहीं शरगाती थी
फिरो सुबह की गिरी नभाता मेरा आँगन
आई मेरे आँगन नमक द्वार छोड़ कर

हृदय द्वार से रूठ प्यार जी चला गया था
अपनी एक सुधार लौटकर खुद आया
सावन पाकर भी जो सूख गया था पलघट
आज उसी में बताता यौवन मर गया है

तुझको पाकर कितना खुश हूँ जग क्या जाने
इसको तो मेरा यौवन नहीं जान सकेगा
कलम नहीं कल में ताकत जो वर्णन कर पाये
मिलने पर ही प्यार हृदय पहिचान सकेगा

तुमने मुझे बुलाया है पर आन सकूँगा न,
करता मजबूरी के घर में गिरफ्तार हूँ
डोली जुल्मों की कंधे पर धरी हुई है
भार बहुत है और अकेला मैं नहीं हूँ

फिर भी तुम होना निराश मत मेरी रानी
तोड़ जुल्म की गंजसिंको जब पाऊँगा
पारा तुम्हारे खुद ही मैं दौड़ आऊँगा।

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