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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
देख न तम

ओ मेरे सपनों की रानी
मेरे यौवन की राजधानी
मुझे विवशताओं के आँगन देख न तुम आँखे भर लेना ।

सब इतना मजबूर कि जितनी
मजबूरी मजबूर नहीं है
सुख से इतना दूर की जितनी
होती रही दूर नहीं है

ओ मेरे गीतों की महफिल के
मेरी आशाओं की मंजिल
पथ पर मजबूरी का पाहन, देख न तुम आँखे भर लेना

बीच भँवर में जीवन नैया
मेरे हाथ पतवार नहीं है
लग पायेगी नाव किनारे
मुझको भी इतवार नहीं है

ओ मेरे गीतों के भाव वन्दन
मेरी बाहों के आकर्षण
सागर लहरों से भुज बन्धन, देख न तुम औरने भर लेना

धुँधली उम्मीदों में न रहा दम
धीमी साँसें
अरत करता से चाहे
धरा घिरी है अपमानी की

ओ अभिलाषाओं के सावन
मेघ बरो उम्मीदों के वृन्दावन
नयनों के पलकों पर सावन, देख न तुम आँखे भर लेना

मधुमासों को लहरों है पतवार की धाई न उपवन
कलियों के होठों पर क्रन्दन
मादक विलख मंधा सुनतिलाक टाय रही उपवन की झाली

सुमनों के हक काकि हर पर कदम, देख न तुम आँखे भर लेना

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