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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
कुर्बानी का वक्त यही — शिवा

शिवा वीर बिन के स्वप्न हुए साकार भगत की वानी ।।

वीर शिवो के स्वप्न हुए साकार भगत की बानी
जीवन का हम मोह छोड़ कर डटे हुए है रण में,
झुका न सकता काल हमें, हम प्रण ठाने है मन में,
भूमि हमारी विर स्वतंत्र है और रहेगी हरदम,

राणा ने करवट ली है सीमा पर युद्ध भवानी ।
शिवा वीर बिन के स्वप्न हुए साकार भगत की वानी ।।

भारत के प्रहरी के मन में धधक रही है ज्वाला,
इन्कलाब की गूँज कर रहा है राणा का भाला,
गली-गली से हर आंगन से यही गर्जना आती,
मातृभूमि के लिए समर में चलो फेंककर माला,

मातृभूमि पर गर मिटने को अड़ा हुआ बलिदानी ।
शिवा वीर बिन के स्वप्न हुए साकार भगत की वानी ।।

हम स्वतंत्रता के रक्षक हमको प्यारी आजादी,
हमसे जो टकरायेगा निश्चित उसकी बरवादी,
झाँसी की रानी की कुर्बानी फिर जाग उठी है,

रणचण्डी साकार खड़ी है, बन झाँसी की रानी ।
शिवा वीर बिन के स्वप्न हुए साकार भगत की वानी ।।

कुर्बानी का वक्त यही साथी त्यौहार मनाली,
काश्मीर भिरमौर हिन्द का उसकी अभी छुड़ालो,
विजय श्री है चरण चूमता भारत के वीरों का
विजयी विश्व तिरंगा अपना ऊँचा और उठा लो,

गीत विजय का गाओ साथी कहती है कुर्बानी ।
शिवा वीर बिन के स्वप्न हुए साकार भगत की वानी

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