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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
सुनो भुट्टो

सुनो भुट्टो तुम्हारी धमकियों से हम न डरते हैं ।।

नहीं यह कायरों का देश जिसको तुम डराते हो,
यहाँ हर आदमी है वीर जिसको तुम जगाते हो,
शेर न होगी खैर तेरी हिन्द का जब शेर जागेगा,
शेर जगाकर हिन्द को तुम मौत ही अपनी बुलाते हो,

देश है सुनो भारत भुट्टो वीरों का जहाँ पर वीर रहते हैं।
सुनो भुट्टो तुम्हारी धमकियों से हम न डरते हैं ।।

बुरा अन्याय का पथ जिस डगर तुम आज चलते हो,
न हम डरते हैं पेकिंग से कि जिस पर तुम उछलते हो,
स्वयं आँखों से देखो टैंक सेवर नेट की दुर्गत,
बना शमशान टैंकों का जहाँ पर नेट जलते हो,

नहीं भारत के योद्धा हाथ चूड़ी पहनते हैं।
सुनो भुट्टो तुम्हारी धमकियों से हम न डरते हैं ।।

उलझता हिन्द से जो है मिटाता नाम अपना है,
सुनो कश्मीर को पाना नहीं आसान इतना है,
हजारों वर्ष तक लड़ना सजाना व्यर्थ सपना है,

न छेड़ हिन्द को भुट्टो, सुनो हम साफ कहते हैं।
सुनो भुट्टो तुम्हारी धमकियों से हम न डरते हैं ।।

तुम्हारे समकियों में खून हिन्दू का ही बहुता है,
तुम्हारी बुद्धि पर आता तरस हमको बहुत भुट्टो
जो अपने बाप दादों को स्वयं बदनाम करता है,

तुम्हारे सम नहीं भारत के योद्धा आह भरते हैं।
सुनो भुट्टो तुम्हारी धमकियों से हम न डरते हैं।

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