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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
यही हमारा नारा है

आओ उसको नमन करें, कण-कण

शहीदों को करना छोड़ अपनी राह शीर ढुकायेंगे
भारत के वीरों ने हमारी मिट्टी वहाया है,

जहाँ एक, होते अनेक हैं धर्म का जो है संगम
हिन्दू मुस्लमान पारसी जहाँ बढ़ते साथ कदम
मंदिर मस्जिद एक जगह पर और वहीं गुरु द्वारा है।

बहती पावन नदियाँ जिस पर है सागर लहराता,
जो वीरों की जन्मदायिनी वह है भारत माता,
बलिदानों की जो बेदी, वीरों ने जिसे उबारा है।

व्यर्थ जिन्दगी वह है जिसको इस मिट्टी से प्यार नहीं
इस धरती पर उसको रहने का क्षण भर अधिकार नहीं
जय बन्दो अब आँखे खोलो दुश्मन ने ललकारा है।

दुश्मन के आगे अपना हम कभी न शीश झुकायेंगे
मातृभूमि के लिए सगर में अपना रक्त बहायेंगे
यही हमारा नारा है।

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