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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
दो हाथ मिले

दो हाथ मिले इसलिए कि करके तुम भी कुछ दिखलाओं।

निर्धन वह हो होता है नगर में,
जो मेहनत का रखता है पास नगीना,
मत दया दृष्टि औरों की साथी चाही.
पास करते सब कुछ अपना वह पसीना,

मत दया दृष्टि पाने को तुम ललचाओं ।
दो हाथ मिले इसलिए कि करके तुम भी कुछ दिखलाओं।

तूफान भी पर्वत भी रोक न पाते,
गर मानव अपनी ताकत को पहिचाने,
व्यवधान दूर हो जाता है उस पथ से,
जिस पथ पर मानव चलता सीना ताने,

साथी बढ़ कर साहस का दीप जलाओं
दो हाथ मिले इसलिए कि करके तुम भी कुछ दिखलाओं ।

बीत जिसने आलस्य बुलाया अपने आँगन,
वह समय जाने पर है पछताता,
जो अपनी झोली श्रम से भर लेता है,
वह मानव जग में है मानव कहलाता,

मत झोली औरों के आगे फैलाओ
दो हाथ मिले इसलिए कि करके तुम भी कुछ दिखलाओं ।

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