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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
प्यार का दीप

तुम मिली प्यार का दीप जलने लगा,

तुम मिली, जिंदगी को जवानी मिली,
रात जो भी मिली वह सुहानी मिली,
पाँव वैसे तो चलते रहे राह पर,
पर तुम्हारे ही कारण रवानी मिली,

देख पतवार मझधार टलने लगा ।
तुम मिली प्यार का दीप जलने लगा ।।

हाथ कंगन जड़ने लगी साधना,
प्यार के गीत गाने लगी कामना,
गीत जो थे अधूरे वे पूरे हुए,
पाँव मेहंदी रचाने लगी कल्पना,

गीत के हाथ कंगन चमकने लगा।
तुम मिली प्यार का दीप जलने लगा

रात रानी खिली देख दिल का मिलन,
चाँदनी आ गई छोड़ अपना গগन,
स्वप्न के होठ थे तड़पते रहे, जो
देख दिल का मिलन पा गये वे खिलन,

स्वप्न के होठ चुम्बन महकने लगा।
तुम मिली प्यार का दीप जलने लगा।

चाह की सेज पर बीन बजने लगी,
रागिनी की गली प्रीति सजने लगी,
प्रीति की डोर से जिन्दगी जब बँधी
प्यार के पाँव पायल झनकने लगी,

होठ पर स्नेह पंछी बहकने लगा।
तुम मिली प्यार का दीप जलने लगा

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