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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
सोचूँगा खातिर

मेरे गीतों वालों सुनःवर मेरे तुम्हारे ही गभी,

मैं सविता इस दुनियाँ में सब हृदय होना
मानवता कफन पहन मरघट की पहुँच गई,

रोते-रोते वह गये जाने वो वर्ष मगर,
जिसकी यौवन ने चाहा उसको पान सका।
मैं दोष किसे दूँ दुनियाँ को या अपने की,
जो गया रूठ कर मुझसे, वापिस आन सका।

यह देख जगत की निर्दयता दिल ने रोया,
जब नहीं हमारे घावों को वह घाव कहीं।
जिसकी खतिर चातक से मन में भाव भरा,
वह कहता मेरे दिल में उसकी चाव नहीं।

मैं नाव चलाता रहा बिना पतवार लिए,
इसलिए कि कोई कह न सके है धीर नहीं ।
है तड़पतड़प उठता मेरा व्यथित हृदय,
जब कहती दुनियाँ दिल में मेरे पीर नहीं।

गर दुनियाँ मेरे आँसू को आँसू कहती,
संतोष हमारे व्यथित हृदय को मिल जाता
गर दया दृष्टि जग की हो जाती मुझपर तो
है बुझा हुआ जो दीप हमारा जल जाता।

लेकिन यह व्यर्थ कल्पना होगी जीवन में,
इसलिए कि आशा की है कोई किरण नहीं ।
मधुमास रूठकर चला गया जब मधुवन से,
कलियों की गलियों में आ सकती खिलन नहीं ।

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