तुम कराओ या अपमानित
पर प्यार करलो नहीं हास गर माँग फिर मत पहुँनाओ
राहेखीता फाहिप हूनी रावता तू,
तिरानी प्यार नहीं है
मैं उसे मिला पावन उपहार समझाता हूँ।
वह जो हेरा गीना वर्गी न हो पाये,
जिस आँचल में था कभी हमारा प्यार पला ।
वे रंगीन सरों में गेरी सर गिभी,
नहीं चाहता वशी दिरावने से पाये ।
वे रूखों की मेरी ढाँव रही थी,
नहीं चाहता आँसूओं से गर गायें।
वह मेहंदी लगी हुर्डनी न हथेली थी,
निरापर नैने हिरवा था वेवल प्यार गाता
वह कभी न रानी हो बसन्त या पतझार हो,
तिर्षाजी गावना निरार्ग हो वह नहीं प्रीति ।।
वह कंगन जिसको मैंने अपना प्यार दिया,
वह रहे खनकता यही हमारी इच्छा है।
वह रहे खनकता यही हमारी इच्छा है।
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