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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
बुझे सितारे आते हैं

पर तुम्हारे घाट पर तो सितारे आते हैं

तेरे घर व्याह स्वाता होगा
उजियाला मेरे आंगन को बदा सिर्फ है अंधियारा ।

तेरी इच्छायें करती होगी रंगरेली।
लेकिन मेरे दिल पर चलता रहता आरा ।।

खुशियाँ बहार के चौराहे पर जब गाती हँसती
मेरे अधरों पर विवशता है।
जब प्रीति सजाती मेहदी नई हथेली पर
मेरे उपवन को देता पतझार न्यौता है।

मेरे यौवन पीड़ को जब है सहलाता।
तेरी बाहों में झूम रहा कोई होता।
जब प्यासी प्यास हमारे अधरों पर रोती।
तेरे अधरों की चूम रहा कोई होता

जब मेरे मन के उपवन में पतझार है राता
तेरे तब केश राजे होते हैं फूलों से
जब हर सिंगार तेरी बगायों में गाता है।
उठता मेरा यौवन चुमन बबूलों से ।।

तुम रोती होती तो गुड़राह हो परवाद
बदनामी के घाव रहाने उठाया
तुम भले हो टूटे
दीप हमारे त्यागन का
तेरे त्यागन दीप नहाना त्यागया

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