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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
शासन

जहाँ अन्धेरा बासने करता,
विपदा जिस घर पर हो छाई
सूनापन में रंगा हुआ हो
जैसे विधवा रहे कलाई ।

बचपन बीता वहीं हमारा
यौवन पहनी वहीं उमर है।

बदनामी से सजा हुआ हो
उम्र अमावस सी हो जिसकी
निकल रही आवाज जहाँ से
पहनाई या समझो सिसकी
निश्चित समझो वह घर मेरा
वहीं करार है।

जग में मेरा
और न परिचय मुझसे पूछ
क्यों हूँ दर्दवाद का गायक
क्यों हैं दर्दवाद का प्यारा

दर्द वाद का बनी पुजारी
प्रीति महल से तोड़ नाता,
दर्द वाद का बनो पुजारी,
काशी मथुरा, वृन्दावन से
पावन तनिक न व्यथा हमारी ।

विरह घाट पर इच्छाओं की
जलने दो धू-धू कर होली
राख बन चले मधुर कल्पना
उसे बना माथे की रोली
समझो बेड़ पार हो गया
पास आ गई पीर विचारी ।

दर्दवाद का दीपक केवल
आँसू ईधन से जलता है
इसकी अपनाने वाले को
नहीं प्यार बहला, छलता है
खिड़की से मत झाँको साथी,
आओ सुख की खोल किवारी ।

वही बनेगा मेरा हमदम
मन में जिसके पनि निराशा
रूप नगर का राज कुँवर है
पर जिसका यौवन है प्यासा
रात चाँदनी पहने सिन्दर
जगर प्रीति रह सके ववारी ।

तड़पन में जो पाता सुख है
उल्झन ही जिसको हो भाता
द्वारा मानव का ध्येय बिलखना
दर्दवाद उसका है भाता
वैभव रंग का फाड़ो कुर्ता
आहे रंग में रंग लो सारी।

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