शुरा का से बढ़ कर है
दीनहान दुःखी की रोचा करना
कोई काम नहीं आता है
राम राम बार माला अपना का
बन्द करो छल कपट किवारी
देख तुझे पथहीन तुम्हारा ईश्वर भी तुझा पर गाया शरमाता
गीत न गाता व्यथा सुनाता
आह राग का मेरा स्वर है।
व्यथा डगर से जा सकते हो,
और न आगे जाता पथ हो,
नहीं उरी तुम पा सकते हो,
वहीं हमारा घर उल्झन का
वहीं हमारा जन्म हुआ है
बिलख बिलख कर तड़प-तड़प कर
मेरी विरह का जाती है
समझा न मेरा करो उपवन
वह मेरा पावन मगहर ।
आह राग का मेरा स्वर है।
दर्द वाद का मैं हूँ गायक
व्यथा नगर में मेरा घर है,
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