लिए कामना परोपकार का चलता दीप, वही जल पाता।
मानवता से बढ़ कर साथी,
होता छोटा बड़ा धर्म,
चुन चुन पथ पर फूल बिछा,
गीत प्यार का गाओ, भाओ
गीर नहीं वह मार्ग जीवन, वह नहीं खोता जल जाता ।
सत्य कल्पना के आँगन में
वह दीप जो उग वह जाता,
अपने घर के साथ-साथ ही
औरों का घर जगमगाता
सुना रहे न कोई आँगन
वह दीप जो पीछे डर नहीं जगत में मुस्काता ।
करे नहीं अभिमान तनिक वह
ज्ञानी नहीं ज्ञान का सागर,
बिन वृत्त जो मोली गर
खुद भर जाता उसका गर
नफरत को मत पास बुलाओं
पर नहीं है पतन निःस्वार्थ भाव से चलता ।
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