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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
हमला वारों से

ऐ पाक के हमला वारी,
सुनतातुम्हारा फर्ज है,

तुम जन्म से ही बेताब हो शैतान
मनुष्य नहीं हैवान हो
तुम्हारा धर्म तुझा पर रोता है
इसलिए कि युद्ध का तुझी मर्ज है

दोस्त पताको करना छोड़ दो शैतानी
कश्मीर से अपना पाँव मोड़ दो।
कश्मीर कार नहीं मिलने को इसका स्वप्न तोड़ दो
इसलिए कि काश्ठ तुम्हारा नहीं हिन्द का है

अपने देश में जाओ मानवता का गीत गाओं
अपनी जनता को देखो
जो भूखों तड़प रही है, बिना खाये सो रही है
रात दिन पेट पर हाथ रखे अपनी किस्मत पर रो रही है।

युद्ध करना आसान नहीं,
यह मदिरा का पान नहीं,
लन्दन में खिलर काग पकड़ कर
यह नाव और गान नहीं

अक्ल से कह
क्यों पर करते हो यार सार

तुम बहुत गरजते हो
इतने पर भी हम तुझे माफ कर देंगे
अपना दोस्त बना ले
लेकिन कब
जब तुम अपना दोनों कान पकड़ कर
केवल दो बार उठोगे बैठोगे।

हम तुझको इससे अधिक सजा नहीं देंगे
इसलिए कि तुम नादान हो
बड़ी से बेजान हो शरीर
और सबसे बड़ी बात यह कि तुम पकड़े
हुए अपना दोनो कान हो ।

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