ला दो कलम और दावात
है बढ़ाता जा रहा यह पीर, दिल में दर्द
बोलो क्या करूँ,
झाँकता बौछार, खिड़की बन्द, मैं असमर्थ, बोलो क्या करूँ
कब सुहाती है अकेले मेरे को बरसात,
ला दो कलम और दावात
सारा सूनापन हमारे और कुछ हैं कल्पना में,
लग रहा मेरे लिए ही, जन्म लीं हैं यात नायें,
यह हकीकत है, अरे ! सुन लो हमारी बात,
ला दो कलम और दावात ।
फुस फुसाती बन्द कमरे में कहीं से आ रही आवाज,
किस अधर पर कौन गढ़ता ताज इसका कौन जाने राज,
पास मेरे है बिछौना और अपने सिमसिमाते रात गात
ला दो कलम और दावात
अब न रोकी जा सकेंगी उठ रही जो भावनायें,
है निमन्त्रण दे रही, मुझाको গগन से नभ घटायें,
डाल झूमती है बाहर फड़ फड़ाते पात
ला दो कलम और दावात ।
सोचता हूँ ढाल कुछ इनको कागज के अधर पर,
बह सके संसार मेरी मन के इस लहर पर,
कहने देना इस सृजन को तुम कहीं उत्पात,
ला दो कलम और दावात
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