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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
आज गूँगी चाह मन की

आज गूँगी चाह मन की मौज में कुछ जा रही है,

आज तो महाधार लगता,
बाहुओं का है खिलौना,
और लहरों पर बिछाया,
चाँद चाँदी का बिछौना,

यह मिलन की रात लगती.
हृदय की है रात मेरी,
और लगता माथ पर है,
स्नेह का जलता दिठौना,

यामिनी में चाँदनी मेरे हृदय को यों रही है,
आज गूँगी चाह मन की मौज में कुछ जा रही है।

प्यार मन का नापता है,
हृदय की गहराइयों को,
और भरती जा रहा है,
दो दिलों की खाइयों को

दो हृदय मत कह अरे अब
एक दिल है एक केवल
जो मापकर जो नापता है
तन लहर तरुणाइयों को ।

आज मन की प्यास पहली बार प्यास बुझा रही है।

सत्यता में है बदलती,
जा रही सब कल्पनायें,
खिल रही है कुमुद जैसी,
तरुण दिल की भावनायें,

साथ के हैं गात ऐसे लाल,
जैसे गाल फूल गुलाब के हैं,
और गढ़ जाती अधर पर,
ताज प्रीति की हवायें,

चाँद की किरणें हमारी साध की बहला रही हैं।

सारा में है बविले इतनी
जो हिमालय की हिला दे,
चाँद सूरज स्नेह दीपक,
और तारों को जला दे,

रोम पुलकित और गेरा,
जी-जी हारे हैं,
प्रीत इतनी है टिकानी,
फूल बंगर में खिला दे,

आज रहरों नाव गरी प्रीति मंजिल पा रही है।

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