जब भी माँगा तुमने अपने पाने की पानी,
तूने गहराने की है आजमाई नहीं ।
कब कहने से आँगन में आता है सावन,
कब कहने से करता श्रृंगार बता उपवन,
कब यौवन पहना करता कहने पर कंगन,
छू तुम्हारे कहने की खग गमन पानी
सुन ली होता है पर यह नहीं इतना दानी ।
अनबन जीवन में आग लगा देता है,
पतझार यौवन में दर्द जगा देता है,
उठता है मरघट भी देख विवशता,
जब अधरों को मधुमास दगा देता है,
मत पनघट से माँगो तुम नयी जवानी,
देगा तुम्हें वह फिर से नयी रवानी ।
पलने वाले सारे सपने साकार नहीं होते हैं,
मिलने वाले सारे कंगन उपहार नहीं होते हैं,
झूठे बोलों को मत समझो अमृत,
क्योंकि वे सब उद्गार नहीं होते हैं,
तुम कदम मिलाओ मत उनसे जिनके मन में बेईमानी,
तुम साथ उन्हीं के चलो जो तेरे हैं जानी पहचानी ।
ऐसा कोई न उगर ऐसी जिस पर हो मौत नहीं ललचायी,
कोई न डगर ऐसी जिस पर हो आफत कभी न आयी,
कोई न उधर ऐसा जिसपर रहती हरदम अरुणाई,
कोई गगरी नहीं यहाँ जो पूरी हो भर पाई,
पूरे होने के चक्कर में गत रह जाओ अज्ञानी,
जो मिला उसी से पूर्ण करो तुम अपनी राम कहानी
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