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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
तुलसी दास — कवि के भावों का

लेकिन कवि के कमल करों का साथी रत्न नहीं मरता है

तुलसी के भावों का पनघट
हर मानव की प्यास बुझाता,
पहुँच गया गर उसके तर तक
कोरा गागर भी भर जाता,

दह जाते हैं महल और गिर जाती दीवारें वैभव की
लेकिन कवि के भावों से जो निर्मित भवन नहीं मरता है।

सपना वह जिस सपने में,
उत्तम का गुणगान भरा हो,
दीप नहीं वह बुझ सकता,
जिसके उर में कल्याण भरा हो,

क्षण में मिट जाती है हरती, राजमुकुट की राजमहल की
लेकिन कवि के कल्प सेज पर आया सपन नहीं भरता है।

दिया सहारा कम्पित स्वर को,
राम नाम का मन्त्र पढ़कर,
चाहा जिसने कभी नहीं कुछ
कर जीवन अपना न्यवछावर

वक्त ठहरता तनिक नहीं है, नहीं अगर मानव का तन है
लेकिन कवि के मुख से निकला साथी वचन नहीं मरता है।

वह गंगा का तीर जहाँ पर तुलसी घिराता रहा वन्दन
वह पत्थर, उस जल की धारा
पावन उस मिट्टी का कण-कण

लेकिन मर्यादा पुरुषोत्तम के प्रति भजन नहीं भरता है।

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