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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
तुलसी दास — नमस्कार

जो नवयुग का निर्माता है,
उसको मेरा है नमस्कार,
शत् शत् प्रणाम है बार-बार

हर मानव जिसका पान करें,
तुलसी वरा वह गंगावर है,
जो सबकी प्यास बुझाता है,

उसको मेरा है नमस्कार,
शत्-शत् प्रणाम है बार-बार ।

मर्यादा पुरुषोत्तम का,
जो मिटकर भी गुणगान करे,
सन्देश अमर दे मानव को,
जो नवयुग का निर्माण करे,

जो सबका भाग्य विधाता है,
उसको मेरा है नमस्कार,
शत् शत् प्रणाम है बार-बार

जिसके भावों ने दिया ज्योति,
वह हर मानव का प्यारा है,
वह हर बागों का खिला सुमन,
हर गलियों का उजियारा है,

जो सबको दीप दिखाता है,
उसको मेरा है नमस्कार,
शत्-शत् प्रणाम है बार-बार

हो गई धन्य धरती पाकर,
तुलसी जैसा बेटा महान,
जो सबके मन को भाता है,

उसको मेरा है नमस्कार,
शत्-शत् प्रणाम है बार-बार

जिस साथ में वह जाता था,
भाषा वह शाशी कैसे रही दीन,
भाषा जिस शाशो में सन्देश अगर
कह सकता उसको कौन हीन,

जो नव इतिहास बनाता है,
उसको मेरा है नमस्कार
शत्-शत् प्रणाम है बार-बार ।

तेरे पावन चरणों पर ली
हम अपना शीश नवाते हैं,
स्वीकार करों यह तुच्छ भेट
हम स्नेह प्रसून चढ़ाते हैं,

जो जग कर हमें जगाता है,
उसको मेरा है नमस्कार,
शत्-शत् प्रणाम है बार-बार

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