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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
तुलसी के प्रति

जब तक दमकता है सूरज গগन में,
मैं कहता हूँ तुलसी अगर ही रहेगा।

मानव हुआ धर्म से जब है विचलित,
तो निकल গগन में है तुलसी सितारा,
डूबती नाव महाधार में जब है पड़कर,
तो दौड़ा है उसको बचाने किनारा,

जब तक अरे सत्यता है वचन में।

प्रकृति के वरद पुत्र तुलसी की बानी,
नहीं हो सकेगी कभी वह पुरानी,
भरा है जो तुलसी ने जागर में सागर,
अरे वह है अमृत नहीं वह है पानी,

जब तक अरे कल्पना है सृजन में

हो गई धन्य तुलसी को पाकर धरा यह
दमकने लगी ज्योति तम को मिटाकर,
विवश सो गया धर्म जो था जगत में,
उठा आँख मलते वो बादर हटाकर,

जब तक अरे भावना है उड़न मन में,

बताया डगर जो हमें द्वार आकर
वह तुलसी का सन्देश अब भी अगर है,
मिटाया जो अँधियार उजियार बनकर,
वह सूरज नहीं सूर्य का वह जिगर है,

जब तक अरे कुछ अमर है कफन में।

श्रृंगार जिसने किया है प्रकृति का
ईश्वर पे जिसने चलाई कलम है,
नमित शीश उसके है चरणों पे मेरा,
भुलाएँ उसे जो मुझे यह कसम है,

जब तक चमकता है सूरज গগन में।

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