तुलसी एक का है पनघट
हिना में खेल है पावन हिगत,
तुम्हारी श्रेरी सरिता का तट,
जिसकी अथाह है गहराई,
विस्तार वहाँ तक फैला है,
तुलसी जानो वह है मधुघाट,
सन्देश छिपा है बचपन का,
आलोक, प्रेम के बन्धन का
रण कौशल, जिसमें भवित भाव,
कर्तव्य राह क्या जीवन का ।
तुलसी समाज का है वह बट,
जो देता है अज्ञान दान,
जिसमें अनेक होते समान,
चलते फिरते है साथ-साथ
जिस हाथ में अज्ञान-ज्ञान ।
छू सका न जिसकी तनिक कपट
यह तुलसी का ही पावन मन,
गाया जिसने है राम भजन,
पाहा जिससे है कभी नहीं
धन का करना है अभी सूजन ।
वह कवियों का था राज मुकुट,
जिसके बतलाये पथ पर चल,
पाते कविगण है मंजिल,
स्वीकार करो मेरा प्रणाम,
स्वीकार हृदय का प्रेम कमल
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