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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
विश्व

विश्व जो महान रे कुछ नहीं मनार है।

जिन्दगी में स्नेह का दीप गर जला नहीं,
आदमी को आदमी से प्यार गर मिला नहीं,
व्यर्थ है जहान और व्यर्थ सब बहार है,

चाह है जो बाँह को गगन से उतार ले,
रूप जिसे देखकर हर नयन बहार ले,
होठ, होठ चूम ले कि रोम रोम झूम ले,
प्यार है वही कि जो प्यार दे प्यार ले,

होठ गर खुला हुआ गर न गीत गा सका,
पाँव जो कि चल दिया गर न द्वार पा सका,
व्यर्थ सभी मंजिलें और व्यर्थ द्वार है।
विश्व जो महान रे कुछ नहीं मनार है।

सेज को दिये बिना बहार, रात ढल गई,
प्यास बिना बुझे अगर उम्र ही निकल गई,
पूर्ण हो सकी नहीं आदमी की साध गर,
कामना कफन बिना सामने ही जल गई,

चाँदनी भी रात में सेज गर सजी नहीं,
और होठ पर बढ़ी बिन गर बनी नहीं,
व्यर्थ सेन फूल और व्यर्थ सब श्रृंगार है,
विश्व जो महान रे कुछ नहीं मनार है।

राह है वही कि जो पाँव पाँव चूम ले,
हाथ जो कि हाथ में डाल झूम ले,
हर पथिक के वास्ते द्वार खोल बावरे,
और साथ ले पथिक को पात पात घूमले,

अगर बाँह बाँह की है नहीं सम्हालती,
और बिगर नहीं पार है उतारती,
व्यर्थ सभी नाव और व्यर्थ इन्तजार है।
विश्व जो महान रे कुछ नहीं मनार है।

झूम उठे महफिलें गीत वही गीत है,
दर्द से उबार ले गीत वही गीत है,
लगन है वही कि जो दिलों को जोड़ दे,
साथ जो निभाये अगर बात बात में,

गीत साथ छोड़ दे अगर बात बात में
प्रीति हृदय तोड़ दे लग्न की ही रात में,
व्यर्थ संग मित्र है, और व्यर्थ प्यार है,
विश्व जो महान रे कुछ नहीं मनार है।

दीप है न दीप जो रात भर नहीं जले,
आश है न वह कि जो दो घड़ी में ढल चले,
दिल वही महान और पावन उदार है,
जो घृणा से दूर हो अश्रु देखकर गले,

देख तम बढ़े पर दीप जो न जल सके,
और पर देखकर जो हृदय न गल सके,
व्यर्थ दीप ज्योति, व्यर्थ नीत हार है।
विश्व जो महान रे कुछ नहीं मनार है।

पालकी वही कि जो उतारती रहे दुल्हन,
और है सुबह कि जो सके नई किरन,
गंध एक जो बिखेर दे गली गली,
है वरदान पी जिसे खिल उठे चमन,

किरण अगर माँग की है नहीं संवारती,
और गर दुल्हन नहीं पालकी उतारती,
व्यर्थ सुबह किरण व्यर्थ ही ओहार है।
विश्व जो महान रे कुछ नहीं मनार है।

विश्व जो महान रे कुछ नहीं मनार है।

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