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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
दर्द

दर्द हमारा राजमहल है, पीड़ा मेरी रानी है,
आँखों से झरते मोती की, मत कह देना पानी है।

कैद हुए अरमान हमारे,
लुटी जवानी बातों में,
माँग धुलाई साथ हमारी,
हाय ! मिलन की रातों में,

समझा न पाई दुनियाँ मेरी
कितनी विवश जवानी है।

बिछुड़न मेरा राज सिंहासन,
आँसू पहरेदार है,
अनबन मेरा द्वार पाल है,
उलझन ही श्रृंगार है,

कौन हमारा प्रतिद्वन्दी है,
कौन हमारा सानी है।

विरह नगर से व्यथा नगर तक,
फैला मेरा संसार है,
खुशी नहीं तक पहुँच पाये खुशी
उस हद तक अधिकार है,

राज विन्ह है, क्रन्दन मेरा,
करुणा नगर की पानी है।

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