← कविता सूची
— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
साध

कराग भरग हो गई,
साथ खत्म हो गई,

मानकर पवित्र प्यार पर यकीन कर लिया,
जानकर मधुर मिलन मन तल्लीन कर लिया,
पर न सत्य हो सकी सम की भी कल्पना,
सत्य पीर का मैं अधर पर हाय ! बीन धर लिया,

व्यर्थ हुई साधना,
व्यर्थ हुई याचना,
प्यास जो अधर पे थी बिन बुझे ही जल गई।

जो यह कहे कि पार प्यार यकीन कर,
आज है पता नहीं कि वे चले गये किधर,
उपदेश जो दिये अरे वे न काम आ सके,
दूर सभी हो गये छोड़ विकट राह पर,

पूछता न आज जग
हो गये सभी अलग
देखते ही देखते उम्र ही निकल गई।

यह कैसा भाव है बता दो अब इसे मैं क्या करूँ,
पाँव है फिसल रहे बता इन्हें कहाँ धरूँ,
किया याचना बहुत किरणों पर न जग पसीज सका,

उम्र है खिसक रही,
साँस है सिसक रही,
साँझ तो हुई नहीं और रात ढल गई।

बात तो हुई नहीं साध ढली जा रही,
कामना अपूर्ण है चाह छली जा रही,
हिमायती प्रीति के क्यों न आज बोलते
कफन बिना लाश प्यार की है चली जा रही

बुझ सकी न प्यास है,
शेष बिन ही पि आश
प्यार की लहर मेरी जिन्दगी निगल गई।

papaji Photo
← कविता सूची

पाठक टिप्पणियाँ