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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
साधना

आसराही न देती रही प्राण ! तुम
साधना यह हमारी विफल जायेगी।

रूप क्या है मिला चाँदनी रात हो,
प्यार की माँग में प्राण ! सौगात हो,
चाह कब तक रहेगी कुवारी बता,
साँस कब तक चलेगी किसे है पता।

मुस्कराओ हमारे लिए प्राण ! तुम,
कुछ घड़ी के लिए पीर टल जायेगी।

मानता हूँ मजा इन्तजारी में है,
पर बुझी प्यास कब बेकरारी में है,
रात में बन कुमुद गर खिली प्राण तुम
जब है वादा किया तो निभाया करो,

प्यार का तार जब तब बनाया करो
गीत बनकर अधर पर ढलो प्राण तुम,
यह उजड़ती जवानी सहल नायेगी।

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