प्यास वह राहता रहा जिस घटा के लिए,
वह प्यास मेरी बुझाई नहीं ।
दिल महीने बरस आ गुजरते गये,
पाँच बढ़ते गये पर न मंजिल मिली,
जीत लिखता रहा जिस कली के लिए,
वह कली आज तक खिल न पाई नहीं ।
आस स्नेह के दीप जलते रहे सागे,
कल्पना के अधर थे मधुर हारों में,
रोज सजने लगी थी मिलन रात की,
प्यार की नव किरण हाथ भुजपाश में,
वाह मन में रही जिस किरण के लिए
वह किरण पास आ जगमगाई नहीं।
चाँद, मुझको अकेला यहाँ देखकर,
आ गया खिड़कियों से पवन रूप धर,
चाँदनी मुस्कराई गगन छोर से,
तब बिलखने लगा प्यार का वह सफर
आह भरता रहा जिस मिलन के लिए
वह मिलन रात अब तक है आई नहीं।
है विकट लग रहा जिन्दगी का सफर,
आम जो यह थी मिलन की गई है उत्तर,
यह मेरे लिए अब सभी व्यर्थ है,
जब नहीं मिल सका प्यार का है गर
दर्द सहता रहा जिस लहर के लिए
वह लहर नींद वन की सुलाई नहीं।
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