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— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
पत्नि

मनुआ की जिन्दगी का
पैमाग,
गाँठ का
दाम,
जेल कतरा, कर चुका था,
नये वृत्ते का
काग तमाग ।

पाँव डगमगा रहे थे,
दिन गे तारे नगर
आ रहे थे,

गिरते पड़ते,
गाशा ठोकते,
अपने को रोकते,
मार्ग आँख को कोराते,
किरसी तरह, पहुँचा घर,
देखा मनुआ ताप रहा है

दुकुर-दुकुर,
उसका बढ़ चुका था वार ।

डरते-डरते,
श्रीमती जी से, बोला
मनुआ की माँ
मनवत हो गया,
जेल कतरा,
वृत्ते की जेल,
साफ कर गया ।

यह सुन कर,
श्रीमती जी का चेहरा,
गुरझाया नहीं ।
मुख पर अफसोरा का भाव,
आया नहीं ।

मतलब ?
श्रीमती जी
मेरी पत्नि है
केवल पत्नि नहीं,
सहयोगी है,
जैरो,
रेल के इन्जान से
लगी बोगी हैं ।

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