तुम राज घाट पर फूल वढ़ाने, मत आओ ।
जाओ, लौटा इन फूलों को तुम ले, जाओ ।।
है अन्न वर्ग के लिए तड़पती जब सीता
यह भेट तुम्हारी, कैसे मैं स्वीकार करूँ।
माताओं को, जब मिलता है सम्मान नहीं,
फूलों के गजरों से कैसे मैं प्यार करूँ।
तुम राज घाट पर शेष झुकाने, मत आओ ।
जाओ, लौटा इन फूलों को तुम ले, जाओ ।।
नन्हें बच्चों को, दूध नहीं जब मिलता है,
बालायें, दर-दर भीख माँगती फिरती हैं ।
कैसे सुगन्ध इन फूलों का, मुझाको भाये
जब लाज बेचती अपनी, राधा चलती है ।
तुम राज घाट पर शीश झुकाने, मत आओ ।
जाओ, लौटा इन फूलों को तुम ले, जाओ ।।
जब नहीं झोपड़ी को मिल पाता है प्रकाश,
गेहनत करने वाले का पेट, नहीं भरता ।
कैसे रामाधि पर दीप जलाने, तुझाको दूँ
जब गाँव आधेरे की वाहों में हैं रहता ।
तुम राज घाट पर दीप जलाने, मत आओ ।
जाओ, लौटा इन फूलों को तुम ले, जाओ ।।
जब तक सहता है जनसाधारण, सहता है,
पर सहनशीलता की भी, सीमा होती है ।
आक्रोश न जब तक, रक्त भले ही पानी हो
क्रोधित होता, हर बूँद रक्त का मोती है ।
गुख राज घाट पर आज छिपाने, मत आओ ।
जाओ, लौटा इन फूलों को तुम ले, जाओ ।।
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