← कविता सूची
— कविता —
मुक्ति नाथ त्रिपाठी "मृदुल"
कुछ मुक्तक

(१)

प्यार का रापना रागनाना, व्यर्थ होगा,
इसलिए कि गे, बहारों की नगर से, गिर चुका हूँ ।
रात फिर मधुरात होगी, कल्पना है, कल्पना है,
इसलिए कि गे, सितारों की नगर से, गिर चुका हूँ ।

(२)

जो घृणा दे, प्यार का उसको वगन दो ।
जो उपेक्षा, स्नेह का उसको रतन दो ।
मगर जो छोड़े नहीं उत्पात करना,
मत करो उसको क्षमा, उसको कफन दो ।

(३)

होता है इन्सान, आदगी ।
होता है इन्सान, आदगी ।
होता है भगवान अगर ले,
अपने को पहचान, आदगी ।

(८)

यहाँ स्वर्ग है, वहाँ नर्क है ।
यह विद्वानों का कुतर्क है ।
अगर जान ले मर्ग आदगी,
स्वर्ग-नर्क में, नहीं फर्क है ।

(9)

होठ पर जब प्यास, रीता घट रहा ।
मिल रहा पनघट कि जब दम घुट रहा ।
चाल चेढेगी, निराली है यहाँ,
पात्र गंगा जल, निकट, मारघट रहा ।

(10)

व्यक्ति वह मैं घर गया, पर जी रहा ।
अश्रु को आगृत रागड़ा कर, पी रहा ।
विश्व पर विश्वारा करना है कठिन,
इसलिए खुद कफन अपना, री रहा ।

papaji Photo
← कविता सूची

पाठक टिप्पणियाँ